अनारकली और सलीम: मुहब्बत जो सल्तनत से टकरा गई

राजेश पालशेतकर
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इतिहास में कुछ प्रेम कहानियाँ ऐसी होती हैं जो वक्त की धूल में दब तो जाती हैं, मगर उनका असर सदियों तक महसूस किया जाता है। ऐसी ही एक कहानी है अनारकली और सलीम की—एक शहज़ादा और एक दासी की मोहब्बत की दास्तान, जो सिर्फ दिलों की बात नहीं थी, बल्कि एक पूरी सल्तनत की नींव तक हिला देने वाली बगावत बन गई।

शहज़ादा सलीम – ताज का वारिस

शहंशाह अकबर का बेटा, सलीम (जो बाद में जहांगीर के नाम से जाना गया), एक साहसी, जज़्बाती और बाग़ी मिज़ाज का शहज़ादा था। वह सिर्फ एक शासक नहीं बनना चाहता था, बल्कि एक ऐसा इंसान भी था जो दिल की सुनता था, चाहे उसके सामने पूरा साम्राज्य क्यों न हो।

अनारकली – हुस्न और अदाओं की मूरत

अनारकली मुगल दरबार की एक खूबसूरत दासी थी, जिसकी अदाओं और सौंदर्य ने सिर्फ दरबारियों को नहीं, बल्कि खुद शहज़ादे सलीम को भी दीवाना बना दिया। उसकी मुस्कान में शहज़ादा अपनी जन्नत देखता था, और उसकी आँखों में वो मोहब्बत जो हर बंधन तोड़ने को तैयार थी।

मुहब्बत का आगाज़

सलीम और अनारकली की पहली मुलाकातें शायद संयोग थीं, मगर उनके दिलों का जुड़ना मुकद्दर था। दोनों एक-दूसरे के प्यार में ऐसे डूबे कि दरबार की दीवारें भी उनकी फुसफुसाहटों से गूंजने लगीं। ये मोहब्बत छुप नहीं सकी, और धीरे-धीरे पूरे दरबार को पता चल गया कि शहज़ादा एक दासी के इश्क़ में गिरफ़्तार हो गया है।

जब सल्तनत को खतरा महसूस हुआ

अकबर एक दूरदर्शी और कड़क बादशाह था। उसके लिए सल्तनत सबसे ऊपर थी—प्यारा बेटा भी नहीं। उसे डर था कि अगर सलीम एक दासी से निकाह करेगा, तो उसकी राजनीतिक और शाही छवि को ठेस पहुँचेगी। उसने इस रिश्ते को तोड़ने की हर मुमकिन कोशिश की, मगर सलीम पीछे हटने वाला नहीं था।

इश्क़ की सज़ा

इतिहास और किवदंतियों के अनुसार, अनारकली को सलीम से अलग करने के लिए अकबर ने एक क्रूर फैसला लिया। बताया जाता है कि उसे ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया गया। कुछ लोग मानते हैं कि उसे भाग जाने दिया गया था, तो कुछ कहते हैं कि सलीम ने गुपचुप उसे बचा लिया। लेकिन जो भी हुआ, सलीम और अनारकली का इश्क़ अमर हो गया।

एक इश्क़, जो आज भी जिंदा है

अनारकली और सलीम की मोहब्बत की गूंज आज भी लाहौर की गलियों में सुनी जा सकती है, जहाँ अनारकली का मकबरा मौजूद है। ये कहानी सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि उस इश्क़ का प्रतीक है जो तख्त और ताज को भी ठुकरा देता है।


निष्कर्ष

अनारकली और सलीम की प्रेम कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्चा प्यार न जात-पात देखता है, न ओहदा। वो सिर्फ दिल से दिल का रिश्ता होता है—जज़्बों से बंधा हुआ, हिम्मत से जिया गया, और कुर्बानी से अमर बना दिया गया।

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