जब भी अधूरी मोहब्बत की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है हीर और रांझा का। यह सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि दो आत्माओं की ऐसी कहानी है जो समय और समाज की सीमाओं से लड़ते हुए भी एक नहीं हो सकीं। पंजाब की मिट्टी में जन्मी यह दास्तान आज भी उन दिलों को छू जाती है जो सच्चे प्यार में टूट चुके हैं।
प्यार की पहली दस्तक
हीर — एक अमीर जाट परिवार की बेटी, और रांझा — एक साधारण चरवाहा, जिसकी बांसुरी में जादू था। जब रांझा अपने भाईयों से नाराज़ होकर गांव छोड़ता है, तो उसे हीर के गांव में नौकरी मिलती है। हीर की गायें चराने के दौरान दोनों की नज़रें मिलीं, और यहीं से शुरू हुआ वो प्यार जो एक मिसाल बन गया।
समाज की दीवारें और परिवार का विरोध
हीर और रांझा का प्यार धीरे-धीरे परवान चढ़ा, लेकिन हीर के परिवार को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था। एक गरीब चरवाहे से बेटी का रिश्ता? समाज ने भी अंगुली उठानी शुरू कर दी। और एक दिन, जब उनका प्यार सबके सामने आया, हीर को जबरदस्ती किसी और से ब्याह दिया गया।
रांझा का संघर्ष
हीर की शादी के बाद, रांझा पूरी तरह टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने संन्यासी का वेश धारण किया और हीर की तलाश में भटकता रहा। आखिरकार, दोनों फिर मिले और उन्होंने साथ भागने का फैसला किया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
ज़हर से लिखी गई आखिरी लाइन
कहते हैं, हीर के चाचा कैदो ने हीर को ज़हर दे दिया। रांझा जब पहुंचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रांझा ने भी उसी ज़हर को पी लिया ताकि इस दुनिया में अगर साथ नहीं हो सके, तो मौत में ही एक हो जाएं।
आज भी जिंदा है वो मोहब्बत
हीर-रांझा की कब्रें आज भी पंजाब में साथ-साथ हैं। लोग वहां जाकर फूल चढ़ाते हैं, मन्नत मांगते हैं और यह यकीन लेकर लौटते हैं कि सच्चा प्यार कभी मरता नहीं, बस अधूरा रह जाता है।
निष्कर्ष:
हीर-रांझा की कहानी हमें ये सिखाती है कि प्यार अगर सच्चा हो, तो वो ज़माने के खिलाफ भी खड़ा हो सकता है। मगर कभी-कभी, सबसे गहरी मोहब्बतें भी मंज़िल तक नहीं पहुंच पातीं — और शायद इसी अधूरेपन में उनका जादू छुपा होता है।